क्या चुनाव के बाद लोकतंत्र की सही-सलामत वापसी संभव है?

– उमेश त्रिवेदी
– लेखक सुबह सवेरे के प्रधान संपादक है।
– संपर्क : 09893032101
– यह आलेख दैनिक समाचार पत्र सुबह सवेरे के 02 May 2019 के अंक में प्रकाशित हुआ है।

यह सवाल पेंडुलम की तरह हिचकोले खा रहा है कि लोकसभा चुनाव के पांचवें चरण के गरमागरम माहौल में राहुल गांधी की भारतीय नागरिकता पर उठने वाले पुराने सवाल क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा के रणनीतिकारों की ’हताशा’ का प्रतीक हैं अथवा ’अतिशय आत्म-विश्‍वास’ का परिचायक हैं?  ’हताशा’ के मायने यह हैं कि ’क्या भाजपा के पास इस मुद्दे के अलावा ऐसा कोई दूसरा मुद्दा नहीं बचा है कि वो राहुल को बैक-फुट पर खेलने के लिए विवश कर सकें… अथवा ’अतिशय आत्म-विश्‍वास’ भाजपा का यह भरोसा है कि इस माध्यम से वह राहुल के आसपास अविश्‍वास का ऐसा शिकंजा कस सकेंगे, जिसमें उनका दम घुटने लगेगा।’ राहुल की नागरिकता से संबंधित शिकायत को सुप्रीम कोर्ट दिसम्बर 2015 में ही खारिज कर चुका है। 

2019 में दुबारा सत्ता हासिल करने की बेताबी में मोदी-सरकार लोकतंत्र के बुनियादी मानदंडों को दरकिनार कर तुच्छता के उस राजनीतिक-मुकाम पर पहुंच गई है, जहां से देश के लोकतंत्र की सही-सलामत वापसी लगभग असंभव हो चुकी है। राहुल की नागरिकता के सवाल पर लोकतांत्रिक जनता दल के प्रमुख शरद पवार ने कहा कि- ’जब राजग को भरोसा हो गया है कि वह सरकार नहीं बना पाएगी, तो वह ऐसे गैर-मुद्दे बाजार में फैला रही है। मुझे कहते हुए दुख हो रहा है कि भाजपा ने पांच सालों में राजनीति को काफी तुच्छ बना दिया है। यह पार्टी हमेशा झूठे वादों या गैर-मुद्दों पर उलझी रहती है’।  

यहां लोकतंत्र की सलामती का सवाल इसलिए मायने रखता है कि चुनाव-प्रचार में मोदी प्रधानमंत्री के रुतबे को आहत करते हुए अंगभीर और अधीर ज्यादा नजर आ रहे हैं। मुद्दा यह है कि भारत जैसे विशाल और यशस्वी लोकतंत्र के प्रधान-पुरुष याने प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी को क्या उन मुद्दों के जरिए मतदाताओं को बरगलाने का प्रयास करना चाहिए, जो न्यायिक और सरकारी तौर पर खारिज हो चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस एच.एल. दत्तू की अध्यक्षता वाली पीठ ने इसे खारिज करत हुए याचिकाकर्ताओं को फटकार लगाई थी कि ’मेरी सेवानिवृत्ति के दो दिन शेष बचे हैं, आप मुझे मजबूर मत कीजिए कि मैं आपके ऊपर जुर्माना लगा दूं।’ राजनीतिक दलों और उनके प्रमुखों व्दारा मतदाताओं के सामने झूठ परोस कर अथवा भ्रमित करके चुनाव जीतने की कोशिशें लोकतंत्र की सेहत के लिए प्राणघातक हैं। फिलवक्त मसला इसलिए ज्यादा गंभीर है कि खुद सत्तारूढ़ दल के कर्ताधर्ता झूठ और भ्रम के सहारे चुनाव जीतना चाहते हैं। सत्ता की लोलुपता का यह खेल दिन-ब-दिन राजनीति को रसातल की ओर धकेल रहा है।

राहुल गांधी की नागरिकता जैसे भ्रमित करने वाले सवालों पर मोदी-सरकार का रवैया उनकी अगंभीरता और अधीरता को रेखांकित करता है। नोटिस के तत्काल बाद भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा की प्रेस कांफ्रेंस में यह सवाल उछालना कि राहुल गांधी स्पष्ट करें कि ’कौन से  राहुल सच्चे हैं’ … ’लंदन वाले या लुटियंस वाले’…? संबित पात्रा की आपातकालीन प्रेस वार्ता भाजपा की रणनीति को उजागर करती है।      

जनसंघ की बुनियाद पर खड़ी सड़सठ साल पुरानी इस पार्टी ने 1980 में गांधीवादी समाजवाद के आव्हान के साथ भाजपा का बाना ग्रहण किया था। मौजूदा अध्यक्ष अमित शाह के नेतृत्व में दुनिया की सबसे बड़ी काडर-बेस पार्टी होने का दावा करने वाली भारतीय जनता पार्टी की राजनीतिक करतूतें लघुता और संकीर्णता के नए आयाम स्थापित कर रही हैं। भाजपा में ये परिस्थितियां अभूतपूर्व हैं। भाजपा के प्रवर्तक अटलबिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी ने राजनीतिक नैतिकता और शुचिता के जो उच्च मापदंड स्थापित किए थे, वो तार-तार हो चुके हैं।  

राज्यसभा सदस्य सुब्रमण्यम स्वामी की दो साल (2017) पुरानी शिकायत पर गृहमंत्री राजनाथ सिंह के मंत्रालय का नोटिस महज एक रूटीन मामला नही है। चुनाव-प्रचार के शीर्ष पलों में फलक पर इस कागज का लहराना अथवा टपक पड़ना भ्रम का कुहांसा पैदा का करने का राजनीतिक प्रयास है। चुनाव में नरेन्द्र मोदी ऐसा माहौल बनाना चाहते हैं कि उनके अलावा देश के सारे नए-पुराने नेता, जवाहरलाल नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह तक, सभी प्रधानमंत्री संदिग्ध, भ्रष्टाचारी, झूठे, राष्ट्रद्रोही, राष्ट्रविरोधी, सांप्रदायिक, जातिवादी, जन-विरोधी, अदूरदर्शी, लालची, सत्ता-लोलुप लूट-खसोट करने वाले रहे हैं। उनकी अदूरदर्शी और स्वार्थपरक नीतियों के कारण ही देश में दुर्दशा का यह आलम है। मोदी अपवाद-स्वरूप भी किसी नेता के लिए यह नहीं कहते हैं कि देश को यहां तक लाने में उसका कोई योगदान है? राहुल की भारतीयता को संदिग्ध बनाने की कोशिश भी मोदी की इसी रणनीतिक सोच का हिस्सा है।     

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