गठबंधन सरकार में ‘मोदी की निरंकुशता’ को कितना ‘स्पेस’ मिल पाएगा?

लोकसभा-2019 के नतीजों के एक दिन पहले यदि एग्जिट पोल के परिणामों के आधार पर भारत के भावी लोकतंत्र की तकदीर और तस्वीर पर विचार करें तो यह साफ नजर आता है कि देश में जनतंत्र का वह रूमानी दौर अंतिम सांसें गिन रहा है, जिसके प्राणों में संविधान बसा है। एनडीए के सत्तारोहण के समर्थन में स्पष्ट खड़े एग्जिट पोल के परिणामों ने प्रधानमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी की ताजपोशी का ऐलान कर दिया है। लेकिन यह ताजपोशी दो संभावनाओं के बीच झूल रही है। कुछ चैनल संभावना व्यक्त कर रहे हैं कि भाजपा अपने बलबूते पर बहुमत हासिल कर लेगी, जबकि कुछ चैनल के अनुसार भाजपा बहुमत की 272 की स्वर्ण-रेखा से सत्तर-अस्सी सीट पीछे छूट जाएगी। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह द्वारा आयोजित रात्रि भोज में एनडीए के 36 दलों की भागीदारी ने साफ कर दिया है कि दोनों परिस्थितियों में नरेन्द्र मोदी ही एनडीए के प्रधानमंत्री का चेहरा होंगे।
बहरहाल, एनडीए में अल्पमतीय भाजपा का प्रधानमंत्री होना और बहुमत प्राप्त भाजपा का निर्द्वंद प्रधानमंत्री होने में जमीन आसमान का अंतर है। लोगों ने अभी तक प्रधानमंत्री के रूप में उस नरेन्द्र मोदी को देखा है, जिसकी पार्टी के पास अपना बहुमत था और वह हमेशा फर्स्ट-पर्सन में बात करता था, जबकि अल्पमतीय-भाजपा के साथ एनडीए की मिली-जुली सरकार के राजनीतिक तकाजे ’खुद’ के ’खुदा’ होने के उनके गुमान को आसानी से स्पेस नहीं देंगे। यहां यह सवाल उद्भूत होता है कि यदि मोदी को अल्पमतीय भाजपा की मिली-जुली सरकार चलाना पड़ी तो उनके चेहरे की भाव-भंगिमाओं की रंगत क्या होगी? भाजपा के बहुमत या अल्पमत के साथ मोदी के प्रधानमंत्री होने का मसला सिर्फ उनके सरकार चलाने के मसले से नहीं जुड़ा है। यह मसला कई गंभीर और संवेदनशील मुद्दों की ओर ध्यान आकर्षित करता है।
मौजूदा चुनाव के दरम्यान लोकतंत्र की आबोहवा में कटुता और कलह का जहर घोलकर सत्ता हासिल करने के राजनीतिक प्रयासों ने उजागर कर दिया है कि चाहे जो हो, देश के अगले पांच सालों का सफर कठोर, कंटीला और अंगारों से भरा रहने वाला है। लोकतंत्र के इर्द-गिर्द मंडराते खतरनाक इरादों की भूमिका तैयार हो चुकी है। देश में सत्रहवीं लोकसभा के नए सदस्यों के संवैधानिक शपथ-विधि समारोह की पूर्व-बेला में सबसे पहले तो महात्मा गांधी सलीब पर टंगे हैं और नाथूराम गोडसे, भगत सिंह जैसे शहीदों की शहादत में नाम दर्ज कराने की कतार में खड़े हैं। गोडसे के महिमा-मंडन के साथ महात्मा गांधी की आलोचनाओं के सुनियोजित सिलसिले में इतिहास के पन्नों को फाड़ने के स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं। भोपाल से भाजपा प्रत्याशी प्रज्ञा ठाकुर द्वारा गोडसे की प्रशस्ति के बाद प्रधानमंत्री मोदी का यह कथन कुछ भी स्पष्ट नहीं कर पा रहा है कि ’मैं दिल से उन्हें माफ नहीं कर पाऊंगा।’ मोदी के मुखारविंद से छलकी राजनीतिक-विषाद की यह शब्दावली उनकी चुनावी मजबूरी को ज्यादा बयां करती है। क्योंकि, उसके बाद भी विभिन्न मुद्दों पर महात्मा गांधी को आरोपों के कठघरे मे खड़ा करने के प्रयास बखूबी चल रहे हैं। दोमुंहापन और दोगलापन भारतीय राजनीति की विषाक्त अभिव्यक्ति का मुख्य हथियार रहा है। इस हथियार के सहारे नेता आम जनता को बरगलाने का काम अर्से से करते रहे हैं। गोडसे के मामले में लीपापोती भी इन्हीं प्रयासों का हिस्सा है।
लोकतंत्र की आस्थाओं के हनन के मामलों में मोदी-सरकार का इतिहास साफ-सुथरा नहीं है। प्रधानमंत्री के रूप में मोदी ने जिस प्रकार सरकार के कामकाज का संचालन किया, उसके कारण लोकतंत्र, संविधान और संघवाद की परिकल्पनाएं आहत हुई हैं। चुनाव के दौरान अपने प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ सीबीआई और आयकर विभाग जैसी केन्द्रीय जांच-एजेंसियों का उपयोग पहली बार देखने को मिला है। भयदोहन के हथियारों के इस्तेमाल ने लोकतंत्र में विश्‍वास का संकट पैदा किया है। देश की विविधता, संस्कृति की साझी विरासत, लोकतांत्रिक संस्थाओं का उन्नयन लोकतंत्र की बुनियादी जरूरत होती है। लेकिन इन विषयों को समग्रता से लागू करने के लिए आम जनता की सामाजिक जरूरतों को एड्रेस करना भी जरूरी है। मोदी के कार्यकाल में ऐसे मुद्दों की फेहरिस्त काफी लंबी है, जो उनको निरंकुश शासक सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है। मोदी ने अपनी निरंकुशता को सख्त प्रशासक छवि में ढालकर राजनीतिक रूप से खूब भुनाया है। लोग कहते हैं कि निरंकुशता उनकी प्रवृत्ति का मूल-तत्व है। गठबंधन सरकार को चलाने के लिए एक नैसर्गिक नमनीयता, सहनशीलता और सदाशयता आवश्यक होती है। यह देखना दिलचस्प होगा कि नई पारी में मोदी गांधी-विचारों को सलीब पर टांगने के प्रयासों को कैसे रोकेंगे अथवा खामोश बने रहेंगे। क्योंकि गांधी विरोध से अब चुनाव में नुकसान होने की संभावना नगण्य है।

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