हेट-स्पीच से आहत लोकतंत्र के घावों पर शब्दों का मरहम

शनिवार, 25 मई 2019 को, दूसरी बार प्रधानमंत्री मनोनीत होने के बाद नरेन्द्र मोदी ने संसद के सेण्ट्रल हाल में एनडीए के साढ़े तीन सौ सदस्यों के बीच जो भाषण दिया, उसके राजनीतिक मायनों की विवेचना और विश्‍लेषण का दौर शुरू हो चुका है। इसके पूर्व लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद 23 मई, गुरुवार को भाजपा के केन्द्रीय कार्यालय में आयोजित स्वागत-समारोह में उनके भाषण के अंतर्प्रवाह भी भाजपा की भावी राजनीति की रणनीतिक पहल को रेखांकित करते हैं। चुनाव के बाद मोदी के पहले दो भाषणों को ध्यान से पढ़ा और सुना जाना चाहिए, क्योंकि इनके भाव-पटल पर सफलता की जो इबारत लिखी है, उसे मोदी अपनी सफलता मानते हैं, अपना ’क्रिएशन’ मानते है। सफलता का अपना सुरूर होता है, अपना आवरण होता है, मेक-अप होता है, जिसके पीछे छिपे एहसासों को पढ़ना और पहचानना मुश्किल होता है।
स्वर्णिम सफलता के सुनहरे वर्क में लिपटे शब्दों की इस लंबी दावत का यथार्थ उतना सीधा-सादा, सपाट और आदर्शवादी नहीं है, जितना वह दिखता है अथवा दिखाने की कोशिश की जा रही है। सेण्ट्रल हॉल में मोदी का सवा घंटे का यह भाषण हजारों शब्दों का वह राजनीतिक-पैकेज है, जिसकी हर परत पर शब्दों की अभिव्यंजना में कूटनीतिक-भावनाओं का रूपाकार चौंकाता है। मोदी की नाटकीय भावाभिव्यक्ति कभी आश्‍वस्त करती है, तो कभी आशंकित करती है। मोदी के भाषणों के कई आयाम हैं। इनके सिरों को पकड़ना आसान नहीं है। कहना मुश्किल है कि मोदी के शब्दों का यह ’ल्युब्रिकेंट’ हेट-स्पीच से आहत लोकतंत्र के टूटे ’मोमेण्टम’ की रफ्तार लौटाने में कितना मददगार होगा…? यह कहना भी मुश्किल है कि सवा घंटे के संबोधन में नरेन्द्र मोदी खुद को जिस भूमिका के लिए सज्ज बता रहे हैं, उसमें वे कितने खरे उतरेगें…?
वैसे भाजपा के सूत्रधार चाहेंगे कि मोदी के भाषणों को, उनके द्वारा उच्चारित शब्दों को, फेस-वेल्यू के अनुसार ही समझा और समझाया जाए। शब्दों की भाव-व्यंजनाओं का कूट-परीक्षण नहीं किया जाए। यह संभव नहीं है। प्रधानमंत्री की कुर्सी पर पदारूढ़ किसी राजनेता को यह सुविधा कतई हासिल नहीं हो सकती है कि उसके भाषण के निहितार्थों को अनदेखा और अनसुना कर दिया जाए। यह इसलिए भी संभव नहीं है कि उनका कहा-सुना जहां सामाजिक-समीकरणों को प्रभावित करता है, वहीं राजनीति की लहरों को भी उव्देलित करता है।
पिछले कार्यकाल में नरेन्द्र मोदी ने महात्मा गांधी के बाद सरदार वल्लभ भाई पटेल, सुभाष चंद्र बोस, लाल बहादुर शास्त्री जैसे कांग्रेस के नेताओं को फोकस में रख कर अपने राजनीतिक-एजेण्डे को आगे बढ़ाया था। मोदी के दूसरे कार्यकाल में मोदी के ’पोलिटिकल-ऑर्बिट’ में आचार्य बिनोबा भावे की एण्ट्री हुई है। मोदी ने अपने भाषण में उनको उद्धृत करते हुए कहा है- ’’आचार्य बिनोबा भावे कहते थे कि चुनाव बांट देता है। यह दूरियां पैदा करता है, दीवार बनाता है, खाइयां बना देता है।’’ लेकिन बकौल मोदी ’’इस चुनाव ने दीवारें तोड़ने का काम किया है। यह चुनाव सामाजिक एकता का आंदोलन बन गया है। भारत के लोकतांत्रिक-जीवन में देश की जनता ने एक नए युग में प्रवेश किया है।’’ मोदी के भाषणों में विरोधाभास की कहानी यहीं से शुरू होती है। पिछले तीन महीनों में उनके भाषणों की ’हेड-लाइंस’ सामाजिक एकता की उनकी थ्योरी पर सवालिया निशान लगा रही है।
देश और समाज के टूटने और जोड़ने से जुड़ा मोदी-आख्यान विवादों से परे नहीं है। इस सवाल का सुनिश्‍चित उत्तर अभी तक सामने नहीं आ पाया है कि उनके छप्पन इंच के सीने में लोकतंत्र के पुरोधाओं के संस्कार कितने और कैसे अंगड़ाई ले रहे हैं? ये सवाल लोगों के जहन में भले ही कुलबुला रहे हों, लेकिन राजनीति के फलक पर अभी शांत बैठे हैं। वैसे भी कहावत है कि ’नथिंग सक्सीड लाइक सक्सेस’ याने सफलता के उन्मादी क्षणों में सिर्फ वही कहानियां टंकार भरती हैं, जिनमें खूबियों का जिक्र होता है। कमियों की विवेचना हाशिए पर ढकेल दी जाती है।
मोदी के पहले दो भाषणों का ’टेक्स्ट’ उनकी भावी राजनीति का रोड-मैप है। इसमें संवैधानिक-प्रतिबध्दता और लोकतांत्रिक-उदारता की वो मिसालें शामिल हैं, जिनके कथा-नायक जवाहरलाल नेहरू और अटलबिहारी वाजपेयी जैसे महान राजनेता हैं। इस मर्तबा चुनाव में घृणा और विव्देष की राजनीति ने लोकतंत्र को गहरे जख्म दिए हैं। मोदी लोकतंत्र के घावों का इलाज शब्दों के मरहम से करना चाहते हैं। लोग मोदी की भाषण-शैली के कायल हैं, लेकिन अपनी ’कथनी’ और ’करनी’ की पिछली बुनियाद पर वो इसमें कितने सफल होगें, यह देखना दिलचस्प होगा…!!

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