जब हमारी लापरवाहियों से बच्चे मर रहे हों तब ऐसी तस्वीरें उजली ‘दस्तक’ हैं…

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कुपोषण के चलते मध्य प्रदेश में हर रोज 92 बच्चों की मौत हो रही हो (जनवरी 2018 में मप्र महिला एवं बाल विकास विभाग के आंकड़ें), जब बिहार में चमकी बुखार से 152 से अधिक बच्चों की मौत हो चुकी है तब मप्र के पन्ना में कुपोषित पौने दो साल की बालिका विनीता को जीवित और पर्याप्त वजनी देखना सुखद अचरज से कम नहीं है। कुछ समय पहले विनीता का वजन 1 किलो 900 ग्राम था। वह दिन-ब-दिन गंभीर कुपोषण की तरफ बढ़ रही थी। तभी ‘दस्तक अभियान’ आरंभ हुआ और आज उसकी स्थिति के बारे में दूसरी तस्वीर बता रही है। दस्तक अभियान चार जिलों में पांच संगठनों की पहल है जिसके तहत उन्होंने समुदाय को साथ लेकर कुपोषण को मात देने के लिए कई तरह के नवाचार किए। ये प्रयास वास्तव में उन आदतों और समस्या ओं को बदलने का उपक्रम हैं जिन पर सरकार का ध्यान अमूमन नहीं जाता।

भोपाल के स्वयंसेवी संगठन विकास संवाद के साथ उमरिया में जैनिथ यूथ सोसायटी, रीवा में रेवांचल दलित अधिकार मंच, पन्ना में पृथ्वी ट्रस्ट और सतना में आदिवासी अधिकार मंच ने मिल कर कर 2015 में दस्तक अभियान आरंभ किया था। ये वे जिले हैं जहां कुपोषण तमाम प्रयासों के बाद भी बच्चों की जान ले रहा है। विकास संवाद के सचिन जैन के मुताबिक सरकार या महिला एवं बाल विकास विभाग व स्वास्‍थ्‍य विभाग गंभीर कुपोषित बच्चों के उपचार पर ध्यान देते हैं मगर मध्यम या कम कुपोषित बच्चों को गंभीर कुपोषण से बचाने के उपाय प्रभावी नहीं है। ऐसे में दस्तक अभियान ने ग्रामीणों से उनका सहयोग लेकर बच्चों का कुपोषण दूर करने के प्रयास किए। इन संगठनों के केवल आईसीडीएस सेवाओं, आंगनवाड़ी व स्‍वास्‍थ्‍य प्रणाली को ही सशक्त करने में सहयोग नहीं किया बल्कि ग्रामीण जीवन के उन छोटे-छोटे कारणों को भी टटोला जिनके कारण बच्चों को पोषण नहीं मिल पाता। जैसे, बच्चे पोषित तो तब हों जब उन्हें पौष्टिक आहार मिले। इन जिलों में अध्ययन कर संगठनों ने पाया कि ग्रामीण परिवारों के यहां केवल 2 माह ही सब्जी उपलब्ध होती है। इस समस्या का समाधान करने के लिए 4 हजार से अधिक परिवारों के यहां किचन गार्डन विकसित करवाए गए। यह जानकार आश्चर्य होगा कि बीते तीन सालों में इन परिवारों ने करीब 90 लाख मूल्य की सब्जियां अपने किचन गार्डन में उगाई है। उनके बच्चों को अब 2 माह नहीं बल्कि 6 से 8 माह तक घर में उगी सब्जी खाने को मिलती है। इसी तरह, दस्तक अभियान ने पाया कि पेयजल बड़ी समस्या है। साफ पानी न होने से बच्चे बीमार पड़ते हैं। फसलों को सिंचाई का पानी नहीं मिलता। जनता को ही साथ लेकर क्षेत्र में 160 से अधिक जल संरचनाएं बनाई गईं। छोटे किसानों को बीज दिए गए। उन्हें जैविक खेती के लिए प्रोत्साहित किया गया। इन प्रयासों का परिणाम क्या हुआ? ये संगठन रीवा, पन्ना, उमरिया और सतना के करीब 731 बच्चों को गंभीर कुपोषित होने और उनकी जान बचाने में कामयाब हो गए।

भारत में कुपोषण खत्म करने के लिए समुदाय की भूमिका बढ़ाने की स्वप्निल बातों के आगे यह कदम उदाहरण है कि कुपोषण के तात्कालिक और मूल कारणों जैसे माता-पिता के रोजगार, लैंगिक असमानता, स्वास्थ्य सुविधाओं आदि पर ध्यान देना आवश्यक है। असल में ये प्रयास समूचे तंत्र के लिए मॉडल की तरह है कि गंभीर कुपोषित बच्चों को इलाज और पौष्टिक आहार देने जितना ही जरूरी है कि कम या मध्यम कुपोषित बच्चों को टारगेट कर उन्हें गंभीर कुपोषित होने से बचाया जाए। ऐसा कर बच्चों की जान के साथ हम गंभीर कुपोषित बच्चों के उपचार में होने वाले खर्च को भी घटा सकते हैं। जन भागीदारी ऐसे अभियान को अधिक स्थायित्व देती है और उनकी सफलता की गारंटी होती है।

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