‘गौर’ नदी को प्रवाहमान बनाते श्रमवीर सांसद

शक्ति सौरभ
जबलपुर (एजेंसी) । तपती गर्मी और बादलों की लुका-छिपी के बीच निःस्वार्थ भाव से पसीना बहाते श्रमवीर । नर्मदा मैया जय, जल की रक्षा कौन करेगा, हम करेंगे-हम करेंगे जैसे नारों के साथ दोगुना उत्साह जुट जाते हैं। यह दृश्य था पड़वार ग्राम में गौर नदी के पुनरुद्धार के लिए प्रारम्भ जल रक्षा अभियान का । ‘गौर’ की टूटती धारा को अविरल और प्रवाहमान बनाने का भगीरथ प्रयास भाजपा प्रदेश अध्यक्ष एवं जबलपुर सांसद राकेश सिंह के आव्हान पर प्रारम्भ हुआ।

जल रक्षति: रक्षिताम : अर्थात हम जल की रक्षा करें और जल हमारी रक्षा करेगा। यह ध्येय वाक्य बेईमानी सा हो गया है। प्रकृति प्रदत्त इस अनमोल उपहार को व्यर्थ गवां रहे हैं। जल स्तर लगातार घटता जा है। कंक्रीट के जंगल का विस्तार केवल शहर ही नहीं गाँवों को भी आगोश में ले रहा है। परिणामतः भूमि में पानी के रिसाव का रास्ता बंद। जल संचय का संकट।

जबलपुर जो जाबालि ऋषि की की समृद्ध परम्परा का संवाहक रहा है। जिसे रानी दुर्गावती जैसी वीरांगना ने सुशोभित किया हो। जो बावन ताल और बहत्तर तैलयों से जल संचय का उदाहरण प्रस्तुत करता हो। अभियांत्रिक दृष्टि से इन तालाबों की संरचना इस प्रकार बताई जाती है कि एक तालाब के भरने के बाद जल प्लावन दूसरे में, फिर तीसरे में और क्रमशः अंतिम ताल तक पहुँच जाता था। जल संरक्षण और संवर्धन की यह व्यवस्था अद्वितीय थी। शहर प्राकृतिक रूप से वातानुकूलित बना रहता था।

मध्य प्रदेश की संस्कारधानी के नाम से प्रसिद्ध जबलपुर में कई छोटी नदिया हैं जो अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हैं उन्हीं में से एक है गौर नदी । इसे नया जीवन देने के लिए सांसद सिंह के नेतृत्व में स्थानीय लोगों के सहयोग से स्टॉप डैम बनाया जा रहा है जो गेबियल स्ट्रक्चर तकनीक पर आधारित है। इसमें छोटे-छोटे पत्थरों को इकठ्ठा कर लोहे की जाल बांधा जा रहा है ताकि वह एक बड़े पत्थर का आकर ले सके और पानी के वेग को सह सके। उसके बाद बोरियों में मिट्टी भर उसके ऊपर जमाया जाता है। इस तकनीक से हम जल का संचय कर जलस्तर में बृद्धि कर सकते हैं। जलस्तर में हो रही लगातार कमी से नदी के आसपास का पारिस्थिकीय तंत्र कमजोर होता जा रहा है।

इस बावत रानी दुर्गावती विवि के भूगोल विभाग के हेड डॉ लोकेश ने बताया कि शहर के डेयरी उद्योग से जुड़े लोगों द्वारा मल-मूत्र आदि अपशिष्ट सीधे नदी में प्रवाहित करने की वजह से गौर समेत शहर की अन्य छोटी नदियाँ अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हैं।

डॉ श्रीवास्तव बताते हैं कि लगभग तीन दशक पहले हम इस नदी स्वच्छ जल में तैराकी किया करते थे। किन्तु अब यह आचमन योग्य भी नहीं है। सांसद सिंह के प्रयास की प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि जनप्रतिनिधियों की ऐसी पहल सर्वथा प्रेरणादायी होती है। ऐसे छोटे-छोटे प्रयास से हम पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी को संतुलित कर सकते हैं।

मानव विज्ञान के विशेषज्ञ मणिन्द्र बताते हैं कि इतिहास में कई छोटी-बड़ी लोक सभ्यताओं का जन्म नदियों के किनारे हुआ है, कई परम्पराएं भी वहीँ से विकसित हुयी हैं। नदियों का संरक्षण इसलिए भी जरूरी हैं की उन सभ्यता और संस्कृति को बचाया जा सके।

गौर नदी के मुहाने पर चल रहे बोरी बांधान कार्य में जनभागीदारी बढ़ाने और उन्हें प्रेरित करने के सवाल पर सांसद सिंह बताते हैं कि इस अभियान की शुरुआत में आसपास के ही गाँव शामिल थे किन्तु अब लगभग 350 गाँव भागीदारी दे रहे हैं। प्रत्येक दिन सुबह 9 बजे से शाम 6 बजे तक कार्य श्रमदान चलता है। भौगोलिक दृष्टि से गौर नदी यहाँ दो विधान सभाओं पनागर और सिहोरा को अलग करती है। एक तरफ कल्याणपुर,बटई,हंसापुर,लोहखेड़ी दूसरी तरह पहाड़ीखेड़ा,सिलपुरी और बिलखेड़ा गाँव है। गौर नदी के इस क्षेत्र में अधिकांशतः जनजाति गाँव स्थित हैं।

जल संरक्षण आध्यात्मिक परंपरा बताते हुए सिंह कहते हैं कि हमारा देश पानी का महत्व जानने वाला भगीरथ देश है, हम सब राजा भगीरथ की संताने हैं, जिन्होंने गंगा मैया को धरती पर उतारा और अखंड राष्ट्र को जल संकट से उबारने का प्रयास किया। उनकी याद में हमने भी जल रक्षा का अभियान छेड़ा है। अलग-अलग स्थान पर जैसी मिटटी होगी, जैसा वातावरण होगा और जैसी पारिस्थितिकी होगी उसके अनुरूप हम विभिन्न प्रयोग कर बरसात में पानी को रोकने और उसे रिसाने का प्रयास करेंगे।

इस क्रम में प्रधानमंत्री मोदी की बातों को रेखांकित करते हुए कहते हैं कि हम समाज के लिए कुछ करने आये हैं। राजनीति उसका माध्यम भर है। इसलिए मुझे पूरा विश्वास है कि हमसब पर्यावरणप्रेमी इस जल रक्षा अभियान से जुड़ेंगे। सामूहिक श्रमदान से हम वर्षा जल संचय के प्रयास में सफल होंगे। गौर नदी पर चल रहा यह अभियान भले ही स्थानीय स्तर का लग रहा हो किन्तु इसका लक्ष्य नर्मदा नदी की प्रवाह को गति देना है। नर्मदा की 19 प्रमुख सहायक नदियों में से अधिकांश सूखे की कागार पर हैं। यदि इन नदियों के पुनर्जीवन के बारे में ना सोचा गया तो नर्मदा की धार कब तक रहेगी कुछ कहा नहीं जा सकता। इसी उद्देश्य से गौर नदी पर जल रक्षा अभियान शुरू किया गया जिसे उम्मीदों के अनुरूप जनसमर्थन मिल रहा है। इस अनथक प्रयास में स्थानीय ग्रामवासी, समाजसेवी,पर्यावरणप्रेमी,गैर सरकारी संगठन और पार्टी के कार्यकर्ताओं की स्वतःस्फूर्त भागीदारी देखी जा रही है।हि.स.

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