कश्मीर पर क्यों बिलबिला रहा है पाकिस्तान

संविधान के अनुच्छेद 370 में जम्मू-कश्मीर को भारतीय राज्यों में विशेष दर्जा देने वाले प्रावधानों को समाप्त किए जाने और उसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांटने की मोदी सरकार की सफल और सख्त कार्रवाई का जम्मू-कश्मीर समेत देश के अन्य भागों पर जो सकारात्मक असर पड़ा उससे सरकार की साख बढ़ी है। यह नि:संदेह भारत का आंतरिक मसला है। सरकार की कार्रवाई से लोकतान्त्रिक व्यवस्था में कोई भारतीय सहमत या असहमत तो हो सकता है। लेकिन, इस मामले में सबसे नकारात्मक, बेहूदी और विचित्र प्रतिक्रियाएं सीमा पार पाकिस्तान से आई हैं। वैश्विक व्यवस्था में यह सुस्थापित सिद्धांत है कि किसी भी देश के अंदरूनी मसलों में पड़ोसी या दूसरे किसी भी देशों का एक सीमा से ज्यादा कुछ कहना या हस्तक्षेप का प्रयास करना उसकी संप्रभुता को चुनौती देने जैसा होता है। इस बात को बखूबी जानते हुए भी पाकिस्तानी नेताओं और मीडिया ने भारत सरकार की कार्रवाई पर ऐसी प्रतिक्रिया की है, मानो भारतीय कार्रवाई अपने राज्य पर न होकर पाकिस्तान पर ही हुई हो। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान और सरकार में उनके सहयोगी मंत्रियों से लेकर विपक्षी दलों तक ने और यहां तक कि पाकिस्तानी मीडिया ने भी पूरे घटनाक्रम को ऐसे पेश किया मानो यही उनके देश का सबसे महत्वपूर्ण मसला है। पड़ोसी की किसी कार्रवाई की निंदा और आलोचना से आगे बढ़ते हुए इस मुद्दे पर पाकिस्तानी आनन-फानन में संसद का विशेष सत्र तक बुलाया गया जिसमें सांसदों ने भारत के खिलाफ अपनी भड़ास निकाली। संसद में ही पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने घोषणा की कि वह कश्मीर मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी ले जाएंगे। ले जाओ! तुम्हें रोकता कौन है? लेकिन, आज की स्थिति में तुम्हारी भारत के विरुद्ध सुनेगा कौन?
पाकिस्तानी सेना के कोर कमांडरों की बैठक भी इसी नतीजे पर पहुंची कि जम्मू-कश्मीर में भारतीय कार्रवाई का कड़ा विरोध होना चाहिए। बैठक के बाद पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष जनरल कमर जावेद बाजवा की टिप्पणी आई कि पाकिस्तानी सेना कश्मीरियों की लड़ाई में हमेशा की तरह अंत तक उनके साथ खड़ी रहेगी। कश्मीरियों की लड़ाई है भूख, बेरोजगारी और बदहाली से, जिसे पैदा किया है खुद पाकिस्तान में जन्मे, पनपे, प्रशिक्षण प्राप्त आतंकवादियों ने। जिसे पाकिस्तान पालता है। यह सारी दुनिया जानती है। ऐसी ही भावनाएं पाकिस्तान के लगभग सभी दलों के नेताओं ने व्यक्त की। शाहबाज शरीफ, बिलावल भुट्टो जरदारी से लेकर पाकिस्तानी विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी, रेलमंत्री शेख रशीद अहमद, फवाद चौधरी आदि सभी ने एक सुर से कश्मीर को पाकिस्तान के लिए जीवन-मरण के प्रश्न जैसा महत्वपूर्ण बताते हुए भारत की कार्रवाई के खिलाफ दुनियाभर में आवाज उठाने की बात की।
अब प्रधानमंत्री मोदी को संयुक्त अरब अमीरात ने अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान से क्या नवाजा कि पाकिस्तान तिलमिलाने लगा। उसे वास्तविक व्यावहारिकता की सीख तो मुस्लिम राष्ट्रों से ही लेनी चाहिए।
ऐसे में यह समझना भी महत्वपूर्ण है कि आखिर ऐसा क्यों है? पाकिस्तान के लोगों को यह बात समझ में क्यों नहीं आती कि जम्मू-कश्मीर से जुड़े मामले भारत के आंतरिक मामले हैं। उन्हें इस पर अपनी सीमा पार नहीं करनी चाहिए। पिछले 70 सालों से कश्मीर पाकिस्तान के लिए कोई भूभाग भर नहीं रहा है, बल्कि पाकिस्तान ने गरीब जनता का ध्यान बंटाने के लिए उसे जीवन-मरण का प्रश्न बना रखा है। इसी कश्मीर पर कब्जा करने के इरादे से अंग्रेजों से स्वतंत्रता मिलने के कुछ ही दिनों के भीतर पाकिस्तानी नेतृत्व के इशारे पर कबाइलियों ने हमला बोल दिया था और राज्य के एक तिहाई हिस्से पर काबिज भी हो गए थे। उनके लिए ऐसा करना धार्मिक विभाजन के आधार पर अस्तित्व में आए देश के निर्माण के आधार को पुष्ट करने जैसा था। वे इस बात को मानने-समझने के लिए तैयार ही नहीं थे कि मुस्लिम बहुल कश्मीर घाटी वाले जम्मू-कश्मीर का विलय पाकिस्तान में न हो। पाकिस्तानियों के लिए कश्मीर पर से दावा छोड़ने का मतलब अपने अस्तित्व के आधार को नकारने जैसा ही है। इसीलिए वे पिछले 70 सालों से कश्मीर को भारत से अलग करने के लिए कश्मीरियों के बीच अलगाववाद की आग भड़काने के लिए दुष्प्रचार, आतंकवाद और युद्धों समेत निरंतर छद्म युद्ध का सहारा लेते रहे हैं। जिन्ना की कल्पना भले किसी मुस्लिम बहुल लोकतांत्रिक देश के निर्माण की रही हो। अपने अस्तित्व के तर्क की रक्षा करने के क्रम में ही पाकिस्तान एक देश के रूप में गठित होने के बहुत ही कम समय में सेना को ज्यादा महत्व देने वाले देश में बदल गया। कश्मीर ही वह स्थायी मुद्दा है जिसके कारण पाकिस्तानी समाज का मानस निरंतर भारत विरोधी और सेना समर्थक बना। इसी मानसिकता ने पाकिस्तान को सैन्य तानाशाहियों का शिकार बनाया। इसी दौर में धार्मिक कट्टरता को लगातार बढ़ावा देकर सैन्य शासकों ने जनता से ताकत हासिल की और पाकिस्तान को धर्माश्रित देश बनाते हुए उसे सेना समर्थित नाम भर के सीमित लोकतंत्र में बदल दिया। धार्मिक आधार पर बने किसी देश की तार्किक परिणति भी यही थी। ऐसे में पाकिस्तानी नेताओं, समाज और सेना से कश्मीर मुद्दे को दरकिनार कर अपने राष्ट्रीय जीवन के अन्य पक्षों के बारे में सोचने की उम्मीद ही निरर्थक है।
यहां यह उल्लेखनीय है कि पाकिस्तानी समाज के हर प्रमुख तंत्र पर पंजाबी समुदाय का ही कब्जा है। यह पाकिस्तानी पंजाबी समुदाय ही वह सबसे बड़ा समुदाय है जिसे भारत से अपने अस्तित्व का भय खाये जाता है। पाकिस्तानी सेना में भी पंजाबियों की ही प्रधानता है और भारत के प्रति घृणा और नकारात्मक भावों को पालने-पोसने-फैलाने का काम भी इसी समुदाय ने सबसे ज्यादा किया है। कारण जो भी हो, सिंध, बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा जैसे दूसरे राज्यों के पाकिस्तानियों में भारत के प्रति वैसा नकार और बैर का भाव कम ही दिखता है जैसा कि पंजाबियों के बीच। यही वह मानसिकता है जो पाकिस्तानियों को अपने इतिहास, भूगोल और वर्तमान से जुड़े वास्तविक तथ्यों को यथावत स्वीकारने से रोकती है और वे कश्मीर के मुद्दे से वे कभी मुक्त नहीं हो पाते हैं। कश्मीर के एक हिस्से और गिलगित-बाल्तिस्तान पर उन्होंने 1947-48 के युद्ध में कब्जा कर लिया था। और, जब भी पूरे कश्मीर के एकीकरण की दिशा में प्रगति की पहल होगी, ये क्षेत्र पाकिस्तानी अधिकार क्षेत्र से निश्चित रूप से निकल जाएंगे। संभवतः यह भय ही पाकिस्तानी शासकों और सेना को प्रेरित करता है कि कश्मीर मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय समर्थन अथवा सहयोग पाने में लगातार असफल रहने और घरेलू मोर्चों पर बेहद खराब स्थितियों के बावजूद वह इस मुद्दे को भारत का आंतरिक मसला मानने की बजाय अपने जीवन-मरण का प्रश्न बनाए रखता है।
भारत के विरोध और कश्मीर मुद्दे को शांतिपूर्ण समाधान से लगातार दूर रखने में उसे चीन से मिल रहे कभी परोक्ष तो कभी प्रत्यक्ष सहयोग की साफ वजह भी नहीं दिखाई देती कि चीन आज केवल अपने व्यापारिक और सामरिक हित के कारण उसका साथ दे रहा है, न कि किसी स्वाभाविक मैत्री के कारण। क्योंकि, चीन की स्वाभाविक मैत्री दुनिया में किसी के साथ है ही नहीं। पाकिस्तान के नेतृत्व, सेना और समाज को जब तक यह समझ में नहीं आएगा कि चीन का साथ भी भारत को उसके आंतरिक मामलों में किसी भी तरह के कदम उठाने से नहीं रोक सकता तब तक वह इस मुद्दे पर भारत से उलझता ही रहेगा और कश्मीर घाटी में स्थितियों को बिगाड़ने तथा सीमा पर उलझने की हरकतों से बाज नहीं आएगा।
(लेखक राज्यसभा के सदस्य हैं।)
-आर.के. सिन्हा

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