देश को मिली पहली विश्व चैंपियन शटलर

किसी विश्व चैंपियनशिप में राष्ट्र गान के बजने पर हर भारतीय को गर्व होना स्वाभाविक है। बैडमिंटन में अब तक भारतीयों को यह गौरव हासिल नहीं हो सका था। अब पीवी सिंधु ने बासिल में विश्व चैंपियन बनकर दिला दिया है। असल में स्वर्ण पदक जीतने वाले खिलाड़ी के देश की राष्ट्रधुन ही पदक समारोह में बजती है। सिंधु के विश्व चैंपियन बनने पर जब यह धुन बजी तो सिंधु की आंखें में भी खुशी में गीली हो गई। इससे पहले कोई भी भारतीय शटलर बैडमिंटन में विश्व चैंपियन नहीं बन सका था। सिंधु को यह सफलता तीसरे प्रयास में मिली है। वह पिछले दो मौकों पर फाइनल में पहुंचने के बाद भी खिताब का सपना साकार नहीं कर सकीं थीं। 2017 में तो वह नोजोमी ओकुहारा से मैराथन मुकाबले में हारीं और पिछले साल केरोलिना मारिन के हाथों हारकर खिताब से हाथ धो बैठीं थीं।
पीवी सिंधु का यह विश्व चैंपियनशिप में पांचवां पदक है। वह अब तक इस स्वर्ण के अलावा दो रजत और दो कांस्य पदक जीत चुकी हैं। इस तरह उन्होंने चीनी खिलाड़ी झांग निंग के विश्व चैंपियनशिप में पांच पदकों के रिकॉर्ड की बराबरी कर ली है। चीनी खिलाड़ी भी सिंधु की तरह लंबे कद की खिलाड़ी थीं। दोनों के खेल में काफी समानता दिखती है। लेकिन चीन के पास सिंधु जैसे तूफानी स्मैश नहीं थे। सिंधु ने फाइनल में ओकुहारा को फतह करने के दौरान 340 से लेकर 364 किमी. प्रति घंटे की रफ्तार से स्मैश लगाए। अगर हम सिंधु के स्मैशों की तेज गेंदबाजों से तुलना करें तो 10 मील की रफ्तार वाले शोएब अख्तर भी उनके आसपास नजर नहीं आते हैं। बैडमिंटन में आई रैकेट की नई स्ट्रिंग की वजह से ही यह संभव हो पाया है।
पीवी सिंधु विश्व खिताब जीतने वाली पहली भारतीय शटलर हैं। उन्होंने ओकुहारा को फतह करने के दौरान जिस तरह की फिटनेस का प्रदर्शन किया, वैसी फिटनेस अन्य किसी खिलाड़ी में देखने को नहीं मिली है। इसलिए बहुत संभव है कि भारत को प्रदर्शन में एकरूपता की कमी वाली समस्या से निजात मिल जाए। वैसे तो सिंधु पर एक समय आखिर में खिताब से हाथ धोने वाली खिलाड़ी का टैग लग या था। इसकी वजह उनका 2016 के रियो ओलंपिक, एशियाई खेल, ग्लास्गो कॉमनवेल्थ गेम्स और पिछली दो विश्व चैंपियनशिप के फाइनल में हारने की वजह से लगा था। बासिल में विश्व चैंपियनशिप में दिखाई तकनीक, दमखम और मानसिक मजबूती यह इशारा जरूर कर रही है कि आने वाले समय में सिंधु का बैडमिंटन में दबदबा देखने को मिल सकता है।
अब सवाल यह है कि पीवी सिंधु क्या अपने प्रदर्शन में एकरूपता बनाए रखकर विश्व बैडमिंटन पटल पर भारतीय झंडा फहराए रख सकेंगी? यह तो आने वाला समय ही बता सकता है। लेकिन उन्होंने जिस तरह से अपने खेल को मुश्किल हालात के लिए मांजा है, वह उम्मीद तो बंधाता है। इस काम में उनकी सबसे ज्यादा मदद की है कोरियाई कोच किम जी ह्युन ने। ह्युन खुद एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीत चुकी हैं। यही वजह है कि सिंधु ने खिताब जीतने के बाद धन्यवाद देने के लिए लिए पुलेला गोपीचंद से पहले उनका नाम लिया। सायना तो सर्जरी के बाद अपनी पुरानी रंगत में कभी दिखी नहीं और सिंधु की खिताब से दूरी बढ़ती देखकर गोपीचंद इस साल अप्रैल माह में किम जी ह्युन को अपने अकादमी में कोच के तौर पर लाए। इनका लाना ही इस बदलाव की वजह नजर आ रहा है।
किम का मानना है कि आप जब उच्च स्तर पर खेलते हैं तो आपका स्मार्ट होना बेहद जरूरी है। इसके लिए वह तकनीक के साथ-साथ हिटिंग पॉवर और मानसिक मजबूती के तालमेल को जरूरी मानती हैं। उन्होंने सिंधु के नेट पर खेल को सुधारने के अलावा उन्हें मानसिक रूप से मजबूत बनाया। इसका ही परिणाम था कि वह पिछली दो विश्व चैंपियनशिपों के फाइनल में हारने के बावजूद इस बोझ के साथ कभी खेलती नहीं दिखीं। इसका ही परिणाम है कि उन्होंने सेमीफाइनल में चेन यू फेई और फाइनल में ओकुहारा के खिलाफ मुकाबला जिस एकतरफा अंदाज में जीता, ऐसा प्रदर्शन करते वह किम के आने से पहले कभी नजर नहीं आई थीं। इसके अलावा किम यह भी मानती हैं कि आप क्या रणनीति बना रहे हैं, इसकी जानकारी सामने वाले खिलाड़ी को नहीं होनी चाहिए। इससे पहले सिंधु ओकुहारा के खिलाफ उसकी लंबी रैलियों के ट्रेप में फंसती नजर आती थीं। इस बार सिंधु ने लंबी रैलियों में फंसने की बजाय 350 से 364 किमी. की रफ्तार वाले स्मैशों से रैलियों को खत्म करके जापानी खिलाड़ी को जमने का मौका ही नहीं दिया।
यह तो सही है कि देश का कोई दिग्गज खिलाड़ी विश्व स्तर पर धूम मचाता है तो इससे युवाओं को अच्छा प्रदर्शन करने की प्रेरणा मिलती है। इसलिए वह यदि प्रदर्शन में एकरूपता की कमी दूर करके सिंधु बुलंदी पर पहुंचती हैं तो लक्ष्य सेन, गायत्री जैसे युवा धूम मचाने को तैयार हो सकते हैं। पर इस इम्तिहान को अभी उन्हें पास करना है। सिंधु की अब निगाह अगले साल टोक्यो में होने वाले ओलंपिक खेलों के गोल्ड पर है। वह यदि ऐसा कर सकीं तो भारतीय इतिहास के पन्नों पर उनका नाम स्वर्ण अक्षरों में लिख जाएगा। पीवी सिंधु के इस खिताब की एक और खासियत रही कि उन्होंने यह खिताब अपनी मां विजया के जन्मदिन पर जीता। इसलिए उन्होंने यह खिताब अपनी मां को समर्पित किया। पिछले करीब एक साल से लग रहा था कि गोपीचंद अकादमी की लाई बैडमिंटन क्रांति पर ब्रेक लग गया है। लेकिन अब सिंधु के साथ साई प्रणीत के कांस्य पदक जीतने से लगता है कि देश के युवाओं को प्रेरणा मिलेगी। यह सिर्फ दूसरा मौका है जब भारत ने विश्व चैंपियनशिप में दो पदक जीते हैं। इससे पहले 2017 में सिंधु ने रजत और सायना नेहवाल ने कांस्य पदक जीता था।
-मनोज चतुर्वेदी

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