भोपाल में बाबूलाल गौर के होने या नहीं होने के मायने…

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मौत की दहलीज पर यह जगजाहिर फलसफा पूरी शिद्दत के साथ उभरता रहता है कि नियति के आगे सब बेबस हैं और जिंदगी का आखिरी मुकाम वो अंधेरी गलियां हैं, जो कहां जाती हैं, यह किसी को भी पता नहीं हैं। फिर भी मौत से पहले अथवा बाद में भी, जिंदगी और जिंदा होने की कहानियों का सिलसिला कभी थमता नहीं है। हर कहानी का अपना सार होता है, जो किसी के होने या नहीं होने के मायनों को बयां करता है और लोगों के मर्म को उत्पेरित करता है। जिंदगी और मौत के इन्ही फंसानों की तरह यह स्क्रिप्ट भी बुधवार, 21 अगस्त 2019 को अलसुबह जिंदगी से रूखसत होने वाले उन बाबूलाल गौर की जिंदगी के उन रंगों से रूबरू करवाती है, जो एक आम आदमी के संघर्ष को बयां करते हैं।
मध्य प्रदेश की राजनीति में, खासतौर से भोपाल में बाबूलाल गौर के होने या नहीं होने के अपने मायने हैं। अस्सी साल पहले 1940 में ग्यारह साल के बालक गौर अपने परिवार के साथ उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले की कुंडा तहसील के गांव ओरीपुर नौगीर छोड़ कर भोपाल में बसने के लिए आ गए थे। भोपाल में उनकी निजी राजनीतिक, और सामाजिक जिंदगी के हमसफर और चश्मदीदों की संख्या अनगिनत है। इन लोगों के पास ’उनकी और उसकी’ अपनी कहानी है, अपना अनुभव और अपनी अटूट रिश्तेदारी है। भोपाल में बाबूलाल गौर के अस्सी साल के सफरनामे में आम आदमी से लेकर देश के शिखर-पुरूषों के नाम और उनकी भूमिकाएं दर्ज हैं। मैं कोई चालीस साल पहले 1980 में गौर साहब से पहली बार मिला था। भोपाल की लिली टाकीज के पीछे एक चालनुमा मकान की दूसरी मंजिल पर उनका कार्यालय था। उस समय वो गोविंदपुरा विधानसभा क्षेत्र से भाजपा के विधायक थे और बहैसियत वकील काला कोट पहने अदालत जाने की तैयारी कर रहे थे। एक पत्रकार के नाते मैं भोपाल के बड़े तालाब की दुर्दशा पर अखबार के लिए स्टोरी कर रहा था और उससे जुड़ी सामग्री की तलाश में उनके पास गया था अखबारनवीसों के लिए गौर साहब खबरों का शाश्‍वत स्त्रोत अथवा कभी भी न सूखने वाला झरना थे। उनके पास हर सूचना होती थी और उसका संदर्भ उपलब्ध रहता था।
1980 की इस पहली मुलाकात के बाद उनसे परिचय दायरा इतना सघन हो गया कि वो जिंदगी में अपनों में शुमार होने लगे। एक मजदूर के रूप में शुरू इस सफरनामे में दिन-ब-दिन क्रमश: उनकी जिंदगी के पन्नों की इबारत भी सुनहरी होती गई…। उनकी हैसियत बदलती गई…उनके मुकाम बदलते गए…काम बदलते गए…। चालीस वर्षों में उनके आसपास काफी कुछ बदला… जनसंघ… जनता पार्टी… भारतीय जनता पार्टी… मजदूर… वकील… विधायक… सीनियर विधायक… फिर मंत्री… वरिष्ठ मंत्री… मुख्यमंत्री और फिर मंत्री…। बरखेड़ी के चालनुमा मकान से चौहत्तर बंगले और श्यामला हिल्स की चोटी पर मुख्यमंत्री निवास की देहरी तक उनके सार्वजनिक जीवन के सफरनामे की राजनीतिक सुर्खियां सीढ़ी-दर-सीढ़ी बढ़ते एक नायाब नेता के जुझारुपन की दिलचस्प कहानी है। इन सारे लाल-सुर्ख घटनाक्रमों के बीच बाबूलाल गौर की जिंदगी में एक स्थायी-भाव देखने को मिलता है कि सत्ता के विभिन्न शिखरों पर विभिन्न पद-नामों की नेम-प्लेट में लगातार बदलाव के बावजूद वो हमेशा ही ’बाबूलाल गौर’ बन रहे। सत्ता की चकाचौंध के बीच बड़े से बड़े राजनीतिक उतार-चढ़ाव को सहजता जीने का उनका जज्बा उनकी जिजिविषा और उनके आत्म-बल को उद्घाटित करता है। राजनीतिक उतार-चढ़ाव का असर गौर साहब पर कभी भी परिलक्षित नहीं होता था। वो जब भी मिले, जहां भी मिले, किसी भी हैसियत में मिले, उऩका अंदाज एक जैसा रहता था। बहैसियत मुख्यमंत्री भी वो वैसे ही रहे, जैसे कि वो विधायक के रूप में रहते थे।
बाबूलाल गौर मध्य प्रदेश में कदाचित भाजपा के एकमात्र ऐसे नेता होंगे, जिन्हें उनके क्षेत्र की जनता ने कभी हारने नहीं दिया। ऐसा अद्भुत जन-समर्थन यूं हांसिल नहीं होता है। उसके लिए किसी भी नेता को ’बाबूलाल गौर’ होना पड़ता है। यह आसान काम नहीं है। शायद इसीलिए मध्य प्रदेश की राजनीति में बाबूलाल गौर का होना या नहीं होना बहुत मायने रखता था। गौर का होना या बने रहना उनके इर्द-गिर्द सिमटे समर्थकों के निजी लाभ-हानि का सबब हो सकता है, लेकिन उनका नहीं होना मध्यप्रदेश में उस सकारात्मक राजनीति के लिए विपल्वकारी है, जो सार्वजनिक जीवन में ओझल होती प्रतीक हो रही है। ’भाजपा, ए पार्टी विद डिफरेंस’ के प्रवक्ता और पक्षधर के नाते गौर साहब भाजपा में हर उस बदलाव के विरोधी थे, जो उसके स्वरूप को विद्रुप बना रही है। सत्ता की मदान्धता का वो मुखर विरोध करते थे। उनके निकट राजनीतिक विरोध अथवा मतभेद निजी दुश्मनी का पर्याय नहीं थे। शायद इसीलिए प्रदेश कि राजनीति की मौजूदा पीढ़ी में वो एकमात्र ऐसे राजनेता थे, जिन्हें पक्ष-विपक्ष के सभी वरिष्ठ नेताओं का सम्मान हांसिल था। राजनीति में वैमनस्य की विष-बेलों को उन्होंने कभी भी पनपने नहीं दिया। अवसान के बाद उनके नहीं होने का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि राजनीति में वैमनस्य और मन-मुटाव की विष-बेलों के विरोध में खड़े होने वाले हाथ अब पंगु हो जाएंगे।
मुझे पता है कि अब हमेशा की तरह हर दिन ‘सुबह सवेरे’ में छपने लेखों को पढ़ने के बाद उनकी शाबासी, सराहना, सहमति और असहमति का फोन कभी नहीं आएगा…लेकिन एक सजग, सतर्क और जिज्ञासु पाठक के रूप में वो हमेशा जहन में बने रहेंगे। ‘सुबह सवेरे’ ने देश और समाज की सकारात्मक चिंता करने वाले एक ऐसे परिपक्व, खुशमिजाज और खुले दिमाग वाले पाठक को खो दिया है, जो हर दिन कुछ नया लिखने और सकारात्मक पत्रकारिता करने के लिए प्रेरित करता था। ‘सुबह सवेरे’ की ओर से उन्हें विनम्र भावांजलि…।

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