मोदी सरकार के सबसे बड़े ट्रबलशूटर रहे जेटली, GST से लेकर राफेल तक अकेले संभाला

नई दिल्ली. लगातार 13 दिनों से लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर रहने के बाद आज देश के पूर्व वित्त मंत्री और बीजेपी के दिग्गज नेता ने अपनी आखिरी सांसे ली. भारत के राजनीतिक पटल पर चार दशक तक एक प्रखर नेता और कुशल रणनीतिकार के तौर पर छाए रहने वाले अरुण जेटली की भूमिका आज भले ही खत्म हो चुकी हो…पर उन्होंने वो कर दिखाया है जो अच्छे-अच्छे नेता नहीं कर पाएं हैं.
अरुण जेटली वो नाम जिसने कदम-कदम पर मोदी सरकार को हर संकट से बचाया.जब-जब मोदी सरकार पर संकट आया जेटली संकटंमोचन बनकर सामने खड़े नजर आए.तो आईए जानते हैं इनसे जुड़ी कुछ बातों के बारे में.
दिल्ली के पॉवर कॉरिडोर में तीन सबसे शक्तिशाली ठिकानों पर अगर कभी एक साथ किसी का कब्जा रहा है, तो वो थे अरुण जेटली.मोदी सरकार में वह ऐसे नेता थे, जिन्हें रायसीना हिल्स स्थित नॉर्थ और साउथ ब्लॉक और उद्योग भवन को एक साथ संभाला.नार्थ ब्लॉक और उद्योग भवन में वो बतौर मंत्री विराज रहे था., हालांकि बाद में डिफेंस मिनिस्ट्री उनके पास नहीं रही.लेकिन उद्योग भवन से वह कारपोरेट अफेयर्स मिनिस्ट्री चलाते हैं.
नार्थ ब्लॉक, साउथ ब्लॉक और उद्योग भवन में अगर काम करने का जेटली को मौका मिला तो यह मोदी सरकार में उनके रुतबे का परिचायक है- ऐसा उन्हें जानने वाले कहते हैं.पिछले साल जब किडनी ट्रांसप्लांटेशन के चलते उन्होंने वित्तमंत्री का कामकाज छोड़ा था.
तब पीयूष गोयल ने उनकी जगह ली थी. जब ढाई महीने बीत गए तो सत्ता के गलियारे में सवाल उछलने लगा- देश का वित्त मंत्री कौन, जेटली या पीयूष गोयल ? खुद यह सवाल बीजेपी सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने भी उठाया था.

अटकलें लगने लगीं थीं कि अर्थव्यवस्था के मुद्दे पर विपक्ष और के हमलों के कारण पीएम मोदी ने उनकी वित्तमंत्री पद से विदाई कर दी है.अब उन्हें कोई दूसरा मंत्रालय दिया जाएगा. लेकिन तीन महीने बाद दोबारा वित्तमंत्री की कुर्सी पर वापसी कर जेटली ने न केवल आलोचकों का मु्ंह बंद कर दिया, बल्कि मोदी सरकार में अपनी पकड़ मजबूत होने का फिर सुबूत दे दिया.. अरुण जेटली और मोदी के संबंधों को करीब से जानने वालों के लिए यह कोई अचरज का बात नहीं थी.

वो जानते थे कि पीएम मोदी अरुण जेटली से उनकी इच्छा के विपरती कोई काम नहीं कराएंगें. इसके पीछे का एक बड़ा कारण वह अरुण जेटली का पीएम मोदी का मिस्टर भरोसेमंद होना भी माना जाता है.. मोदी के दिल्ली आने से पहले से ही अरुण जेटली के साथ उनके नजदीकी संबंध रहे हैं.

ये दोस्ताना दो दशक पुराना है. नजदीकी की वजह का लिंक गुजरात के गोधरा से भी जुड़ा है. यह सरकार में जेटली का प्रभाव ही है कि अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में मंत्री रहे अरूण शौरी कई दफा कह चुके हैं कि मोदी, शाह और जेटली की तिकड़ी ही देश और बीजेपी को चला रही है.
लोकसभा में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल राफेल को लेकर पूरे शबाब में रहे. उन्होंने राफेल डील पर सवालों के गोले दागे, मसला डिफेंस से जुड़ा था.. कायदे से तो सवालों का जवाब उस समय की रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण को देना था. मगर, सरकार की तरफ से तर्कों और सवालों की ढाल-तलवार लेकर अरुण जेटली खड़े हुए..
राहुल के सवालों और अरुण जेटली के जवाब कितने सही-गलत रहे, ये एक अलग बहस का मुद्दा है., मगर जेटली ने एक हद तक राहुल गांधी के तीखे सवालों से सरकार को बचाने की कोशिश की.. राफेल डील पर शुरुआत से लेकर अब तक अरुण जेटली मोदी सरकार के लिए ट्रबलशूटर यानी संकट मोचक साबित हुए.
जितनी प्रेस कांफ्रेंस उन्होंने की, जितनी बार उन्होंने ब्लॉग लिखकर राफेल को लेकर सरकार की तरफ से पक्ष रखा, उतना तो उस समय की रक्षामंक्षी निर्मता सीतारमण ने भी नहीं किया. कई बार सवाल उठे, आखिर ऐसी क्या बात है जो अरुण जेटली पीएम मोदी के लिए हर मर्ज की दवा बन गए हैं. हर बार संकटमोचक नजर आते हैं. चाहे बहस संसद में हो या फिर सड़क पर. जवाब देने के लिए अक्सर जेटली ही सामने होते.
वाजपेयी सरकार की तुलना में मोदी कैबिनेट में प्रतिभाशाली मंत्रियों की कमी है..ऐसे आरोप हमेशा ही मोदी सरकार पर लगते रहे हैं.हालांकि आलोचक कहते हैं कि अरुण जेटली सहित कुछ ही मंत्री ऐसे हैं, जिनमे राजनीतिक ही नहीं हर तरह का चतुराई नजर आती..जो टू द प्वाइंट बहस में भाग लेते हैं और ट्रोलिंग की जगह तर्कों की ढाल बनाकर मैदान में उतरते.. अरुण जेटली मोदी कैबिनेट के सबसे टैलेंटेड मंत्रियों में से एक रहे.
राजनीतिक बहस हो तो वो अपनी वकालत की कला का इस्तेमाल अच्छी तरीके से करते दिखाई देते.. जेटली की अंग्रेजी पर जितनी पकड़ थी, उतनी ही हिंदी पर भी…. वो हमेशा ही एक अच्छे कम्युनिकेटर के रुप में दिखाई दिए..वो हर स्तर पर और हर ढंग से बहस कर सकते थे.. बात रखने के दौरान कभी नरम हो जाते हैं, तो कभी आक्रामक नजर आते… कभी -कभी बहस में वो व्यक्तिगत हमले से भी गुरेज नहीं करते.. जैसे कि एक बार लोकसभा में बहस के दौरान दिखा.. जब उन्होंने राफेल पर बहस के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से कह दिया आथ कि- इन्हें अपना ज्ञान एबीसीडी से शुरू करने की जरूरत है..
बिहार में एनडीए के बीच सीटों की शेयरिंग का मुद्दा फंसा था तो यहां भी अरुण जेटली संकटमोचक की भूमिका में दिखे.. उन्होंने रामविलास पासवान से करीब घंटे भर लंबी मीटिंग कर सीटों का पेंच सुलझा लिया था. जबकि ज्यादातर लोगों को लगने लगा था कि उपेंद्र कुशवाहा के बाद पासवान भी एनडीए से नाता तोड़ देगें.
अरुण जेटली ऐसे नेता थे, जिनके विपक्ष के नेताओं से भी अच्छे रिश्ते हैं. यही वजह है कई बार जब लोकसभा में किसी बिल के मसले पर सरकार को विपक्ष से बातचीत करने को मजबूर होना पड़ा है तो जेटली को ही आगे किए गया. विवादित भूमि अधिग्रहण बिल का मामला ही देख लिजिए.इतना ही नहीं जब ललित गेट प्रकरण को लेकर सुषमा स्वराज पर आरोपों की बौछार होने लगी उस समय उनके बचाव में जेटली पुरजोर तरीके से सामने आए.
आप 2002 से लेकर 2013 तक के अखबारों के पन्ने पलट लीजिए मोदी सरकार को डिफेंट करने से जुडे़ तमाम बयान अरुण जेटली के ही नजर आएंगें. इतनी बीजेपी के किसी भी शीर्ष नेता ने मोदी के पक्ष में बयानबाजी नहीं होगी.बयानबाजी ही नहीं जेटली ने केस में कानूनी मदद भी खूब की. हर क्षेत्र में अपने संपर्कों का भी बखूबी इस्तेमाल भी किया.
पीएम मोदी और अमित शाह का साथ देने के लिए 27 सितंबर 2013 को अरुण जेटली ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को एक चर्चित पत्र लिखा था. इस पत्र को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज भी अपनी वेबसाइट पर संभालकर रखा है. इस पत्र में अरुण जेटली ने यूपीए सरकार पर जांच एजेंसियों का दुरुपयोग कर गुजरात के तत्कालीन सीएम नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह को फंसाने का आरोप लगाया था. अपने पत्र में अरुण जेटली ने हरेन पांड्या से लेकर सोहराबुद्दीन, इशरत जहां, सोहराबुद्दीन जैसे एनकाउंटर केस के जरिए बीजेपी के संबंधित नेताओं को फंसाने का आरोप लगाया था.
मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में भले ही राजनाथ सिंह उपनेता थे. उन्हें आधिकारिक तौर पर सरकार में नंबर दो कहा जाता था. मगर राज्यसभा में लीडर ऑफ हाउस की हैसियत से अरुण जेटली को सबसे प्रभावशाली माना जाता है. बीजेपी के कई नेता यह स्वीकार करने से हिचकते नहीं है कि पीएम नरेंद्र मोदी अगर अमित शाह के बाद किसी को सबसे ज्यादा करीबी और भरोसेमंद मानते हैं, तो वह अरुण जेटली ही थे. ह यही वजह है कि सरकार के ज्यादातर फैसलों में अरुण जेटली की सीधी भूमिका नजर आती थी.. इस भरोसे के पीछे अरुण जेटली का मोदी-शाह को संकट के समय साथ देना था.
जानकार यह भी बताते हैं कि जब मई, 2014 में नरेंद्र मोदी सत्ता में आए तो एक प्रकार से वह दिल्ली के लिए आउटसाइडर ही थे. वो भले ही लगातार तीन बार चीफ मिनिस्टर रहे थे. उन्हें सत्ता के रंग-ढंग मालुम थे, मगर वो इस बात को भली-भांति जानते थे कि दिल्ली गांधीनगर नहीं हैं..
यहां की चाल-ढाल कुछ अलग ही है… नरेंद्र मोदी को अपनी कैबिनेट में एक ऐसे शख्स की तलाश थी, जो दिल्ली और लुटियन्स जोन की रंग-रंग से वाकिफ हो…. उनकी यह तलाश अरुण जेटली पर जाकर टिकती थी.. यही वजह है कि अमृतसर से 2014 का लोकसभा चुनाव हार जाने के बाद भी उन्हें वित्तमंत्री बनाया गया.. डिफेंस और कारपोरेट अफेयर्स मिनिस्ट्री बने.. वे मोदी कैबिनेट के ऐसे मंत्री रहे, जिन्हें एक साथ नॉर्थ ब्लॉक( वित्तमंत्रालय) और साउथ ब्लॉक( रक्षामंत्रालय) में बैठने का मौका मिला…यह उनमें मोदी के भरोसे का सुबूत है.
अब नजर अगर उनके शुरूआती दिनों को कुछ पन्नों पर डाली जाए तो आपको बता दें कि जेटली अपने छात्र जीवन में ही राजनीती से जुड़ गए थे..जेटली छात्र जीवन में एबीवीपी से जुड़े थे…उन्होंने 1975 में इमरजेंसी का विरोध करते हुए इंदिरा गांधी सरकार में 19 महीने तिहाड़ जेल की हवा खाईथी..उनके पिता किशन जेटली दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट में वकालत करते थे. जेटली ने भी कानून की पढ़ाई की और अपने पिता का साथ देने लगे..
मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे जेटली बाद में वकील दोस्त राजीव नायर के साथ मिलकर दिल्ली हाई कोर्ट में वकालत शुरू किए.अरुण जेटली का मुख्य पेशा वकालत ही था.

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