लालजी टंडन : राजभवन में वक्त है बदलाव का…

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मप्र के राज्यपाल लालजी टंडन का परिचय केवल इतना नहीं है कि वे 1952 में जनसंघ के संस्थापक सदस्य बने और फिर उप्र की राजनीति का एक अहम् किरदार बन गए। इसके आगे उनका परिचय जेपी आंदोलन से जुड़ता है। वे पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी के करीबियों में से हैं। उन्हें जब बीते साल बिहार का राज्यपाल बनाया गया तो निष्पक्ष रहने के अपने उद्देश्य को साफ करते हुए उन्होंने कहा था कि वे अब किसी एक दल के नेता नहीं रह गए हैं। उनके परिचय में राजभवन में रहते किए गए कुछ नवाचार भी शामिल हैं। ये नवाचार उन्होंने मप्र में भी बतौर राज्यपाल जारी रखे हैं। राजभवन को जनता के लिए खोलने की परंपरा को जारी रखने के साथ ही राज्यपाल टंडन ने लोकतंत्र के चारों स्तंभों विधायिका, कार्यपालिका, न्याय पालिका और मीडिया का राजभवन से संवाद आरंभ किया है। मप्र के राज्यपाल मीडिया से औपचारिक-अनौपचारिक मुलाकातें करते रहे हैं मगर राज्यपाल टंडन ने राजभवन में इन स्तंभों के सम्मान की परंपरा आरंभ की है। जनता से निकटता के अन्य कार्यक्रम रचे जा रहे हैं।
मप्र में राज्यपाल रहते हुए मोहम्म‍द शफी कुरैशी, भाई महावीर, बलराम जाखड़, आनंदी बेन पटेेल ने जनता से जीवित संपर्क के कई नए कदम उठाए। अब राज्यपाल लालजी टंडन ने राजभवन में प्रमुख संपादकों एवं ब्यूरो प्रमुखों को शॉल एवं स्मृति चिह्न देकर सम्मानित करते हुए कहा कि यह सम्मान किसी व्यक्ति का नहीं है। यह व्यवस्था का सम्मान है। पत्रकारिता हमारे संविधान का चौथा स्तंभ है। बिना उसके प्रयासों के सफल और सुफल व्यवस्थाओं की कल्पना नहीं की जा सकती। सच पूछिए तो यह सम्माोन भारतीय लोकतंत्र का ही सम्मा्न है। जनतंत्र में व्यिवस्था के नाम पर संवैधानि‍क पदों पर बैठे व्यरक्तिैयों की जन से दूरी नहीं होनी चाहिए बल्कि सीधा एवं सतत संवाद होते रहना चाहिए।
हालांकि, ऐसे समय में जब मीडिया की भूमिका को संदेह से देखा जा रहा है, सवाल उठाने की उसकी जिम्मेदारी पर ही सवाल उठाए जा रहे हैं, जब मीडिया को उपहास का पात्र बनाया जा रहा है, जब यह तय करना मुश्किल है कि मीडिया किसका पक्षधर है-लोक का या तंत्र का, ऐसे समय में जब सच कहना मुश्किल माना जा रहा है और सत्ता शीर्ष पत्रकारों से संवाद से परहेज करने लगे हैं ‘राजभवन’ का पत्रकारों से संवाद की पहल करना सुखद लगता है। 
राज्यपाल टंडन अपने विद्यार्थी जीवन में जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन से जुड़े रहे हैं। गुजरे बरस छपरा के सिताब दियारा में जेपी जयंती पर राज्यपाल लालजी टंडन ने बिहार के सभी विश्वविद्यालयों में जयप्रकाश नारायण के नाम पर चेयर स्थापित कर छात्रों को रिसर्च से जोड़ने की बात कही थी। उन्होंने कहा था कि वह समाज व सरकार किसी लायक नहीं होते हैं, जो अपने पूर्वजों को भूल जाते हैं। जेपी से कुछ बिन्दुओं पर मतभेद थे, फिर भी मैं उनके साथ था। 
राज्यपाल टंडन के इन दोनों कथनों में भविष्य का उजास दिखता है। मप्र में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में कई नवाचार किए जा रहे हैं। ऐसे में शोध को बढ़ावा देने तथा छात्र हित से जुड़े मुद्दों पर बतौर कुलाधिपति उनकी दृष्टि शिक्षा की गुणवत्ता को नए आयाम देगी। दूसरा, वे खांटी जनसंघी नेता हैं। उनकी राजनीतिक विचारधारा अलग है और मप्र में सरकार पर काबिज कांग्रेस की विचारधारा अलग हैं। राज्यपाल के रूप में उनकी मप्र में नियुक्ति के राजनीतिक अर्थ तलाशे जा रहे हैं। ऐसे समय में जनता के करीब जाने की राजभवन की किसी भी कवायद को ‘राजनीतिक’ चश्मे से ही देखना कितना उचित है यह दीगर बात, मगर यह कवायद जनता की पीड़ा की सुनवाई के एक मंच के सक्रिय होने की पुष्टि अवश्य करती है।

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