हिचकोले खाती भाजपा में संघ के सुहास भगत आखिर कर क्‍या रहे हैं?

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मप्र में 15 सालों तक शासन करने वाली भाजपा सत्‍ता से क्‍या हटी पार्टी में कई काम बेपटरी हो गए। सत्‍ता के इर्दगिर्द जमी रहने वाली भीड़ तो छंटी ही, पार्टी नेतृत्‍व से असहमति खुल कर सतह पर आने लगी। जिस दल में एक केन्‍द्र हुआ करता था, वहां यकायक कई केन्‍द्र उभर आए। आलम यह कि खुद केन्‍द्रीय नेतृत्‍व को कई मौकों पर हस्‍तक्षेप करना पड़ा। ऐसी स्थितियां मप्र के भाजपा संगठन ने बीते डेढ़ दशक में एक साथ पहले कभी नहीं देखी थी। इन संकटों को देख सवाल उठ रहा है कि राष्‍ट्रीय स्‍वयं सेवक संघ की ओर से पार्टी में भेजे गए संगठन महामंत्री सुहास भगत आखिर कर क्‍या रहे हैं? वे क्‍यों सक्रिय भूमिका में नहीं दिखाई दे रहे?

मप्र की राजनीति को करीब देखने वाले जानते हैं कि यहां निर्णय प्रक्रिया व्‍यक्ति केन्द्रित हो गई थी। अरविंद मेनने के संगठन महामंत्री पद से हटने के बाद तो मुख्‍यमंत्री रहे शिवराज सिंह चौहान पर संगठन अधिक निर्भर हो गया था। विधानसभा चुनाव हारने के बाद संगठन ने अधिक मत-प्रतिशत पाने जैसे तर्क के साथ मन बहलाए रखा मगर लोकसभा चुनाव में ऐतिहासिक जीत के बाद भी संगठन का आत्‍मविश्‍वास लौट कर नहीं आया। एक के बाद एक ऐसे कई प्रसंग हुए जब देश का सर्वश्रेष्‍ठ कहा जाने वाला प्रदेश भाजपा संगठन पंगु नजर आया। सांसद प्रत्‍याशी प्रज्ञा ठाकुर के विवादास्‍पद बयान हों, या विधायक आकाश विजयवर्गीय का बल्‍ला कांड। या विधानसभा में दो विधायकों की क्रास वोटिंग। प्रदेश संगठन असहाय ही दिखाई दिया। यहां तक कि बुलावे के बाद भी 15 विधायक सदस्‍यता अभियान की जरूरी बैठक में नहीं पहुंचे। यह अनुशासनहीनता ही कही जाएगी। मगर पार्टी नेतृत्‍व आश्‍चर्यजनक रूप से हर स्‍तर पर अनुशासनहीता को झेल रहा है।

ऐसे समय में जब पार्टी संकट के दौर से गुजर रही है तब संगठन महामंत्री सुहास भगत की भूमिका की याद आती है। उनमें कुशाभाऊ ठाकरे नहीं बल्कि ठीक पहले संगठन महामंत्री रहे अरविंद मेनन और कप्‍तान सिंह सोलंकी की छवि की तलाश की जा रही है। मगर सुहास भगत अपने इन दोनों पूर्ववर्ती संगठन महामंत्रियों से अलग गुपचुप और बिना पक्ष लिए स्वयं के लिए तय भूमिका को निभाने के अपने सिद्धांत पर अटल हैं। न उन्‍होंने टिकट वितरण के समय पर्दे के बाहर सक्रियता दिखाई और न अब वे बहुत सक्रिय रूप में दिखाई दे रहे हैं।

असल में, कप्‍तान सिंह सोलंकी और अरविंद मेनन की कार्यप्रणाली बहुत आक्रामक थी। वे अपने कार्य को लेकर जितने स्‍पष्‍ट थे उतने ही आग्रही भी। मगर, सुहास भगत सलाह देने तक आग्रही होते हैं। वे अपने निर्णय मनवाने तक आक्रामक रूख अख्तियार करने और किसी का पक्षधर होने के आरोप से बचे हुए हैं। वे खामोशी से अपना काम करने की संघ की परंपरा को भाजपा में भी निभा रहे हैं। यानि, जो दायित्‍व मिला उसे निभाना है। इसके इतर अधिकारों का अतिक्रमण नहीं करना है।

साफ-साफ दिखाई दे रहा है कि अब प्रदेश भाजपा संगठन की वैसी तूती नहीं बोलती जैसी कुशाभाऊ, सुंदरलाल पटवा, प्‍यारे लाल जी के समय हुआ करती थी। अब समूचे देश में भाजपा में राष्‍ट्रीय नेतृत्‍व की अनुगामी हो रही है। ऐसे में सुहास भगत संघ परंपरा का निर्वाह कर राष्‍ट्रीय नेतृत्‍व की मंशा का ही पालन कर रहे हैं। वे संघ और संगठन से मिले निर्देश और योजनाओं को क्रियान्वित करने तक अपनी भूमिका सीमित रखे हुए हैं। संगठन को उनकी इस शैली से क्‍या लाभ और हानि हो रहा यह अलग आकलन का विषय है मगर उनकी यह कार्यप्रणाली भविष्‍य की भाजपा का संकेत दे रही है।

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