सिंधिया को क्यों चाहिए फ्लेक्स अभियान का सहारा?

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प्रदेश कांग्रेस में अध्यक्ष घमासान जारी है। पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को प्रदेश अध्यक्ष बनवाने के लिए समर्थक खुलकर मैदान में आ गए हैं। भोपाल में प्रदेश कार्यालय के बाहर तो ग्वालियर में नदीगेट पर उनके समर्थकों ने उन्हें पीसीसी चीफ बनाए जाने की मांग को लेकर होर्डिंग लगाया। ग्वालियर के होर्डिंग में लिखा है-सोनिया गांधी दबाव में न आएं, सिंधिया को पीसीसी चीफ बनाएं। शिवपुरी में उनके समर्थकों ने चेतावनी दे चुके हैं कि अगर सिंधिया को कमान नहीं दी गई तो वे मुख्यमंत्री, मंत्री और विधायकों को क्षेत्र में घुसने नहीं देंगे। सीहोर के गांव पाचौर में कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता ने 24 घंटे का रामायण पाठ आयोजित कर डाला। दूसरी तरफ, दो दिन के प्रवास पर अपने गृहनगर ग्वालियर पहुंचे सिंधिया ने कहा कि जो पार्टी हाईकमान फैसला करेगा वो सर्वमान्य होगा। 
इन सारी कवायद से सहज एक प्रश्न उठता है कि सिंधिया को क्या अध्यक्ष बनने के लिए इस ‘फ्लेक्स’ समर्थन की आवश्यकता है? उत्तर तलाशने के पहले यह जान लेना आवश्यक है कि सिंधिया का कद क्या है? पार्टी में वे पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के सबसे करीबियों में से हैं। उन्हें प्रियंका गांधी के साथ महासचिव बनाया गया और दोनों को उप्र का जिम्मा तथा पार्टी कार्यालय में एक ही कक्ष भी मिला। दोनों का दफ्तर जिस कक्ष में था वह कांग्रेस के उपाध्याक्ष रहते राहुल गांधी का कार्यालय हुआ करता था। कांग्रेस की राष्ट्रीय राजनीति में अपनी सक्रियता छोड़ वे प्रदेश में आना चाहते हैं तो हाईकमान उनकी बात पहले सुनेगा या सड़क कर इक्का–दुक्का फ्लेक्स लगा कर छेड़ी जा रही मुहिम को तवज्जो देगा? साफ है, यदि हाईकमान अन्याअन्य कारणों से सिंधिया की बात अनुसनी कर रहा है तो फिर इन छिटपुट मांगों को तो बेअसर होना ही है। 
असल में जो लोग अभी नहीं तो कभी नहीं का नारा लगा रहे है वे सिंधिया के हितैषी नहीं बल्कि घातक समर्थक हैं। फर्ज कीजिए, हाईकमान ने यह मांग नहीं मानी तो क्या यह समर्थकों द्वारा करवाई गई सिंधिया की फजीहत नहीं होगी? राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि बेहतर होगा कि सिंधिया ‘श्रीमंत’ के पीछे लगे चाटुकारों की फौज से मुक्ति पा कर विचार करें। कांग्रेस की शीर्ष राजनीति को नासमझी के मोहरों के हवाले न करें। यह बात रेखांकित होनी भी चाहिए, आखिर, यह संधिकाल जो है।

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