क्या ‘गांधी’ को ‘गांधी’ मानने की ईमानदार राजनीति रुखसत हो रही है?

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सवाल टेढ़ा और दुरूह भी है कि अमेरिका की जमीन पर न्यू इंडिया के नए राष्ट्र-पिता के अवतरण की आकाशवाणी (याने ट्रम्प-वाणी) के उद्घोष के बाद अस्थि-पंजरों पर टिके दुबले-पतले, खादी की धोती में लिपटे लाठी के सहारे चलते उस बूढ़े गांधी को कैसे याद करें, जिसे लोग श्रद्धावश (सत्तावश नहीं) अब तक राष्ट्रपिता कहते या मानते रहे हैं? महात्मा गांधी की 150वीं जयंती की पूर्व-बेला में अमेरिका के अल्हड़ राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने जिस अनूठे और अधकचरे अंदाज में भारतीय राजनीति के सरोवर में कूटनीति के जो कंकर फेंके हैं, उससे उठने वाली लहरों में उस राजनीति का खुलासा होने लगा है, जो भविष्य के गर्भ में अंगड़ाई ले रही है। फिलहाल भाजपा के केन्द्रीय मंत्री जितेन्द्र सिंह ने भारत की जनता के लिए सिर्फ एक लाइन की एडवायजरी जारी करते हुए कहा है कि ’’खुद को भारतीय नहीं मानने वाला व्यक्ति ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भारत का पिता कहे जाने पर गर्व महसूस नहीं करेगा।’’
गांधी की हत्या हुए 71 साल बीत चुके हैं। गांधी की जिंदगी के दरम्यान और उसके बाद, कभी भी महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता कहने या नहीं कहने जैसे मसलों में अथवा उन्हें बापू मानने या नहीं मानने जैसे मामलों में भारतीय होने या नहीं होने जैसी कसौटियां प्रचलन में नहीं रही हैं। जबकि हिंदू महासभा और हिन्दुत्व से जुड़े एक तबके की विचारधारा और प्रयास उन्हें राष्ट्रपिता कहने के हमेशा खिलाफ रहे हैं। इसके बावजूद गांधी-विचार के विरोधियों को कभी भी उनको राष्ट्रपिता नहीं मानने के कारण अभारतीय अथवा राष्ट्रद्रोही होने जैसे खतरों से नहीं जूझना पड़ा।
यहां ’फादर ऑफ न्यू इंडिया’ की कूटनीतिक-नामजदगी का यह प्रसंग इसलिए मौंजू है कि इस साल हम याने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केन्द्र की भाजपा-सरकार, गांधी को अपनी थाती मानने वाली अखिल भारतीय कांग्रेस समेत सारा देश महात्मा गांधी की 150वीं जयंती का जश्‍न मना रहा है। यह प्रसंग हमारी वैचारिक-धोखाधड़ी को दर्शाता है कि गांधी के नाम पर देश के राजनेताओं की राजनीति में कितना पाखंड रिस रहा है? यह पाखंड देश के नेताओं की राजनीतिक-गुणवत्ता पर सवालिया निशान लगाता है कि उनके लिए गांधी एक विचार है अथवा एक मेगा-इवेंट, जिसे भुनाकर वो अपने राजनीतिक स्वार्थों को साधना चाहते हैं। ’गांधी’ को ’गांधी’ मानने की ईमानदारी देश की राजनीति से रुखसत हो चुकी है। गांधी होना या गांधी जैसा होना नेताओं के जहन को गुदगुदा जरूर सकता है, लेकिन सही अर्थों में गांधी होना नामुमकिन है। इतिहास की कड़ियों को तोड़-मरोड़ कर सत्ता के खौफ से गांधी बनने के प्रयासों से दिलों की गहराइयों में जगह बनाना संभव नहीं है। देश-दुनिया के महान व्यक्तियों की सूची में गांधी एकमात्र ऐसे व्यक्ति हैं, जो कभी हारे नहीं… न खुद से… न समाज से। उनका नमक, उनकी धोती, उनकी घड़ी, उनका आहार, उनका निराहार, उनका उपवास, उनका आमरण अनशन, उनका असहयोग-आंदोलन, उनका स्वराज, उनके सत्य के प्रयोग, उनका हरिजन, उनका भारत-भ्रमण, उनका अफ्रीकी-आंदोलन, उनका अस्पृश्यता-आंदोलन, उनका स्वच्छता-अभियान जैसे कार्यों और घटनाओं का एक वैचारिक-कैनवास होता था, जिसको वो अपने तरीके से संयोजित करते थे, कार्यान्वित करते थे। उनकी जिंदगी का सबसे उल्लेखनीय तथ्य यह है कि उनके हर कदम में नवाचार, एक विचार होता था।
मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में महात्मा गांधी को एक इवेंट की तरह लोगों के सामने परोसा जा रहा है। यह वैचारिक उथलेपन का परिचायक है। गांधी या गांधी विचार को खत्म करने की कोशिशें लगातार होती रही हैं। उनकी जिंदगी के आखिरी चौदह वर्षों में गांधी को मारने की एक सुनियोजित योजना पर लगातार काम होता रहा। सबसे पहले 25 जून 1934 को पुणे के कार्पोरेशन सभागार में उन पर हमला हुआ था। 30 जनवरी 1948 को उनकी हत्या, हत्यारों का छठवां प्रयास था।
पिछले 71 सालों से राष्ट्र-पिता की मूरत में ढले महात्मा गांधी भारत के राजनीतिक वजूद का स्थायी भाव हैं, लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के न्यू-इंडिया में नए राष्ट्रपिता के काल्पनिक आविष्कार के बाद सत्य के प्रयोग करने वाले महात्मा गांधी के महीन, संवेदनशील और उदार तकाजों के लिए जरूर स्पेस को समेटने का सिलसिला सामने आने लगा है। गांधी भारत की राजनीतिक आध्यमिकता की गंभीर और सार्वजिनक, सर्वमान्य प्रस्तुति हैं, जो समग्रता से लोकतंत्र की विविधताओं को एकाकार और सूत्रबद्ध करती है। दिन-ब-दिन बढ़ती सांप्रदायिक घटनाएं इस बात का परिचायक हैं कि न्यू इंडिया में अनेकता में एकता का भाव विलुप्त होता जा रहा है। घटनाक्रम कह रहे हैं कि महात्मा गांधी की 150वीं जयंती के पुण्य-प्रसंग पर गांधी पर केन्द्रित भाजपा सरकार के ललित निबंधों के पाठ में सहजता नहीं है। सत्ता के सिंहासन के आसपास फल-फूल रही सामाजिक और सांप्रदायिक कुरूपता गांधी-भाव को प्रदूषित कर रही है। गांधी-दर्शन को लेकर मतभेदों का सिलसिला समुन्दर की लहरों की तरह किनारों से टकराता रहा है। फिर भी मतभेदों की हदें 360 डिग्री तक गोलाकार घूमकर सहमति के दरवाजों पर आकर खड़ी हो जाती हैं। गांधी-दर्शन के बिना भारत की राजनीतिक-व्याख्याओं को समग्रता प्रदान करना आसान नहीं है। यह देखना दिलचस्प होगा कि भारत के सवा सौ करोड़ लोग उस व्यक्ति के प्रति, जिसे हम अपना राष्ट्रपिता मानते रहे हैं, न्यू-इंडिया में कितना स्पेस देंगे, क्योंकि राजनीति में सत्ता के बलबूते पर गांधी बनने की नई होड़ शुरू हो चुकी है।

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